फिक्स्ड इनकम चाहिए तो एफडी के बजाय एमएफ में लगाएं पैसा

करोड़ों लोग अपनी बचत बैंकों के FD, PPF, पोस्ट ऑफिस डिपॉजिट वगैरह में जमा कराते हैं। लोगों की बचत का पैसा बैंकिंग सिस्टम के जरिए सरकार और कंपनियों को मिलता है, लेकिन इक्विटी ओरिएंटेड फंड में भले ही उतार-चढ़ाव होता हो, लेकिन अंत में उनसे मिलने वाला रिटर्न खासा बड़ा होता है।



रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में लगातार हो रही कटौती पर पिछली मीटिंग में लगाम लगा दी, जबकि बाजार अहम पॉलिसी रेट में कटौती किए जाने की उम्मीद कर रहा था। हमेशा की तरह जब भी ऐसा कुछ होता है तब इंटरेस्ट रेट, महंगाई और इकोनॉमिक ग्रोथ को लेकर चर्चा का दौर हो जाता है। ऐसा पिछले एक दशक से हो रहा है। ऐसे में अगर म्यूचुअल फंड में निवेश किया जाए तो इससे रिटर्न के साथ दूसरे फायदे भी मिलते हैं। टैक्सेशन स्ट्रक्चर अलग होने से अलग-अलग स्लैब वाले निवेशकों को टैक्स चुकाने के बाद मिलने वाला रिटर्न अलग होता है। टैक्स देनदारी में अंतर इसलिए आता है कि फिक्स्ड डिपॉजिट से हासिल होने वाली रकम इंटरेस्ट इनकम मानी जाती है, जबकि म्यूचुअल फंड का रिटर्न कैपिटल गेंस माना जाता है। इंटरेस्ट इनकम होने पर आपको आमदनी वाले हर साल में टैक्स चुकाना होगा। अगर सभी बैंक एकाउंट और डिपॉजिट्स से हासिल होने वाली इंटरेस्ट इनकम 10,000 सालाना से ज्यादा होती है तो बैंक उस पर 10% के रेट से TDS काटते हैं। अगर आपने बैंक में PAN नहीं दिया है तो TDS 20% कटेगा।



3 साल से ज्यादा पैसा लगाने से ये लाभ: अगर आप तीन साल बाद MF स्कीम रिडीम कराते हैं तो उससे हासिल रिटर्न लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस माना जाएगा और उस पर इंडेक्सेशन का फायदा मिलेगा। आपको इसमें इन्फ्लेशन के हिसाब से एडजस्ट किए गए रिटर्न पर टैक्स देना होगा, जो FD में नहीं होता।